Sunday, January 2, 2011

व्यंग्यजल - बुनियाद हिल गयी है



व्यंग्यजल
बुनियाद हिल गयी है
वीरेन्द्र जैन

दिखती नहीं हो बेशक, हालत बदल गयी है
यह घर नहीं बचेगा, बुनियाद हिल गयी है

अब इस तरह लटकना, हम आपकी नियति है
छज्जा पकड़ लिया है, सीड़ी फिसल गयी है

मुन्नी बहुत थी जिद्दी, लेकिन बहल गयी है
उसे खेल चाहिए था, उसे रेल मिल गयी है

इतनी बड़ी रसोई, इतने रसोइए हैं
वहाँ दाल गल रही थी,यहाँ दाल जल गयी है

सावन बसंत पतझर, आयेंगे जायेंगे भी
बेकार हैं मगर जब ख्वाहिश निकल गयी है

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

2 comments:

प्रदीप कांत said...

अब इस तरह लटकना, हम आपकी नियति है
छज्जा पकड़ लिया है, सीड़ी फिसल गयी है

बढिया है

JHAROKHA said...

aadarniy sir
bahut hi samyik chitran ,bahut khoobsurati ke saath prastut kiya hai aapne.
sadar dhanyvaad sahit ----
poonam