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Thursday, October 14, 2010

व्यंग्य कविता- अस्पताल में नाक का इलाज


व्यंग्य
प्राईवेट अस्पताल में नाक का इलाज
वीरेन्द्र जैन्
पिता को प्राईवेट अस्पताल के स्पेशल वार्ड में रखना
उनके स्वास्थ सुधार से ज्यादा
बेटे की इज्जत का सवाल था
देखने आने वाले रिश्तेदारों में
ऊंची होती थी उनकी नाक
जाते जाते कन्धे पर हाथ रख
वे शाबाशी देते हुए कहते
बहुत कुछ कर रहे हो तुम अपने पिता के लिए
प्राईवेट अस्पताल में पिता मँहगे इलाज और कर्मचारियों की सेवा से
मरने के बाद भी चार घंटे अधिक जिये
आईसीयू में कैद कर उनकी लाश को
लगायी बतायी गयी आक्सीजन
जिसके पैसे पहले ही जमा करा लिए गये थे
बताया जाता रहा कि डाक्टर कोशिश कर रहे हैं
वे जानते थे कि ये
अपने पिता से अधिक
अपनी नाक बचाने आये हैं जिसके लिए वसूला जा सकता है भरपूर।

Wednesday, April 28, 2010

व्यंग्य- पाकिस्तान में अमर सिंह्

क्या पाकिस्तान में भी अमर सिंह होते हैं?
वीरेन्द्र जैन

खबर पाकिस्तान से आयी है
और हिन्दुस्तान के कुछ खास लोगों को बहुत भायी है
खबर सानिया मिर्ज़ा के बारे में है
जिसने अपने हिन्दुस्तानी भाइयों को टाटा करके
पाकिस्तान के शोयेब मलिक से शादी रचाई
उसके वलीमे की दावत में इतने लोग चले आये
कि भीड़ में दूल्हा दुल्हन तक ने धक्के खाये
जितने बुलाये थे
उससे कहीं ज्यादा बिना बुलाये आये थे
मैंने जब यह खबर राम भरोसे को सुनायी
तो पहले तो उसे भरोसा नहीं हुआ
और फिर पूछा- क्या पाकिस्तान में भी अमर सिंह होते हैं?


वीरेन्द्र जैन भोपाल 9425674629

Friday, April 9, 2010

कविता- आँखन देखी- कागद लेखी

आँखन देखी- कागद लेखी
[क्रांति हमारी रही कागज़ों पर]
वीरेन्द्र जैन

उतरा है आकाश कागजों पर
पतझर ओ’ मधुमास कागजों पर
कागज़ के नक्शे पर देश बना
करते रहे विकास कागजों पर
निकली सभी भड़ास कागजों पर
होते रहे प्रयास कागजों पर
वे सबके सब आतंकी घोषित
जो न करें विश्वास कागजों पर

सब सामाजिक न्याय कागजों पर
बँटतीं भैंसें, गाय कागजों पर
पाँच साल में अँगड़ाई लेकर
दे आते हैं राय कागजों पर
जाँचों की अन्धी अनंत गलियाँ
टलती रही बलाय कागजों पर
अत्याचारी खुल कर खेल रहे
होता भी तो न्याय कागजों पर

मिल जाते अनुदान कागजों पर
खुल जाती दूकान कागजों पर
सब मन के मजमून कागजों पर
बन जाते कानून कागजों पर
मैच देखते बंगले पर अफसर
गये देहरादून कागजों पर

हमने मन की कही कागजों पर
क्रांति हमारी रही कागज़ों पर
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

Wednesday, April 7, 2010

पैरोडी- सिंहासन खाली करो उमाजी आती हैं

सिंहासन खाली करो उमाजी आती हैं
[रामधारी सिंह दिनकर की स्मृति से क्षमायाचना सहित]
वीरेन्द्र जैन
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भोपाली ठंडी बुझी राख सुगबुगा उठी
गेरुआ वस्त्र की आग दहकती जाती है
दो राह काल के रथ को ये मामा लोगो
सिंहासन खाली करो उमाजी आती हैं

जो चट्टानों की तरह गौर के पीछे थीं
वे उसी गौर के पीछे पड़ीं हाथ धोकर
वे गोकुलग्राम भूल कर गये द्वारिका को
जैसे कोई सपना भूले उठके सोकर

ये वही उमाजी हैं जिनने तब सरे आम
उस ‘लौह पुरुष’ को कुत्ते सा दुत्कारा था
अब वही हिलाकर पूँछ खड़ा स्वागत करने
जिसकी इज़्ज़त पर उनने डंडा मारा था

जब भी उनका मन हुआ गयीं केदारनाथ
जब भी उनका मन हुआ तिरंगा ले निकलीं
जब चाहा राम और रोटी से खेल किया
जब चाहा भूल गयीं बातें अगली पिछलीं

भगवान हमारी नैय्या पार लगा देना
ये गीत आज भी पूरे हक़ से गाती हैं
दो राह काल के रथ को ये मामा लोगो
सिंहासन खाली करो उमाजी आती हैं

हैं काँप रहीं अब रोज नायडू की टाँगें
सुषमा स्वाराज सोचें ऐसी क्या जल्दी थी
अब अरुण जैटली पेट पकड़ कर बैठे हैं
एलिस इन वंडरलैंड हुये हम्पी
डंपी

जब से आयी है लिब्राहन वाली रिपोर्ट
तब से गोला इक रोज़ पेट में उठता था
कल्याण, पता न जाने क्या कल्याण करें
डर के मारे सीने मैं क्या क्या घुटता था

आ रहीं साध्वी अब तो ‘सच सच’ बोलेंगीं
अब बरी होएंगे सब के सब बाइज़्ज़त से
जो टूट गई मस्ज़िद अब उसका गम भूले
फिर से अध्यक्ष माँगेंगे चन्दे डालर के

जो लौटा करता है वह घर ही लौटा है
अब सारी पिछली बातें भूली जाती हैं
दो राह काल के रथ को ये मामा लोगो
सिंहासन खाली करो उमाजी आती हैं

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629










Monday, November 2, 2009

व्यंग्यजल --अब तो बाहर है अपने बूते से

अब तो बाहर है अपने बूते से
बात होने लगी है जूते से
घूमते फिर रहे हैं आवारा
साँड़ जो बँध रहे थे खूँटे से
एकता की दुहाई के दाता
खुद नजर आ रहे हैं टूटे से
ये मदारी भी खूब हैं यारो
पूछते कुछ नहीं जमूरे से
कितने बारह बरस हुये प्यारे
घूरे अब भी लगे हैं घूरे से

Wednesday, October 7, 2009

व्यंग्यजल - पास आई दिवाली

पास आयी दिवाली
वीरेन्द्र जैन

घर में उगी है घास पास आई दिवाली
सब हो रहे उदास पास आई दिवाली
लक्ष्मी की ओर इस प्रकार घूरतीं मिलीं
जैसे खड़ी हो सास पास आई दिवाली
बत्ती बना के दीये में डालेंगे डिग्रियाँ
एम.ए ओ, बीए पास, पास आई दिवाली
अपना भी अगर होता तो सीधा उसे करते
कोई उलूकदास पास आई दिवाली
सपनों से और यादों से फेंटे ही जा रहे
हम जिन्दगी की ताश पास आई दिवाली

Saturday, July 11, 2009

स्वर्ग का स्टे

एक साधु ने अपने स्वार्थ हेतु
एक सेठ को बरगलाया
और उसे नारकीय पीड़ा का
दिल दहला देने वाला
लगभग आंखों देखा हाल सुनाया।
बोला, -रे अधम,
जब यम के दूत
तुझ लेने आयेंगे
तो तेरे ये सारे ठाट बाट
धरे के धरे रह जायेंगे
लेकिन सेठ बिल्कुल भी नहीं घबराया
क्योंकि वह जानता था कि
सीतारूपी लक्ष्मी हरण के लिये
रावण भी था इसी भेष में आया
सेठ बोला-साधुजी,
यम के दूत हमारा क्या कर पायेंगे
उनके लौटने से पूर्व ही हमारे वकील
हाईकोर्ट से स्टे ले आयेंगे

Wednesday, July 1, 2009

नोट सौ सौ के टूट जाते हैं

ज़िन्दगी इस कदर उदास हुयी
अब वो नाराज़ तक नहीं होती
नोट सौ सौ के टूट जाते हैं
और आवाज़ तक नहीं होती